कौआ की व्यथा
एक बार एक कौआ अपनी रूप रंग और काली काया से काफी व्यथित रहता हैं। उसे यंही लगता है कि उसे कोई पंसद नहीं करता वह जँहा भी जाता हैं उसे सब भगा देते हैं। वह अपनी यह व्यथा लेकर हंस के पास जाता हैं। हंस का सफेद शरीर उसे मोह लेता हैं और वह बोलता है कि तुम तो बहुत ही सुंदर देखते हो इस पर हंस उसे कहता हैं कि मैं तो एक ही रंग का हुँ । तुम तोते से मिलो उसकी चोंच लाल और पंख हरे हैं। तब कौआ तोते के पास जाता हैं। तोते को देखकर वह बहुत खुश होता हैं। पर तोता उस से कहता है कि मुझसे सुंदर तो मोर हैं उसके सिर पर सुंदर कलगी हैं। उसकी लंबी और सुर्ख नीली गर्दन है और पंख काफी बड़े और विशाल हैं जब वह अपने हरे पंखों को फैला कर नाचता हैं तब सबका मन मोह लेता हैं। कौआ जब मोर से मिलता है तो हर्षित हो जाता है उसने इतना सुंदर पक्षी कभी नहीं देखा था। पर मोर उस से कहता है कि मेरी यह सुंदर काया ही मेरे लिए अभिशाप है मेरी सुदंरता के कारण इंसानो ने मुझे कैद कर लिया है और अब में इस पिंजरे में बंद होकर उनका मनोरंजन करता हूँ । मैं अपनी मर्ज़ी से कहीं भी नहीं जा सकता जब इंसानो का दिल करता है तो मुझे नाचना...