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कौआ की व्यथा

 एक बार एक कौआ अपनी रूप रंग और काली काया से काफी व्यथित रहता हैं। उसे यंही लगता है कि उसे कोई पंसद नहीं करता वह जँहा भी जाता हैं उसे सब भगा देते हैं।  वह अपनी यह व्यथा लेकर हंस के पास जाता हैं। हंस का सफेद शरीर उसे मोह लेता हैं और वह बोलता है कि तुम तो बहुत ही सुंदर देखते हो इस पर हंस उसे कहता हैं कि मैं तो एक ही रंग का हुँ । तुम तोते से मिलो उसकी चोंच लाल और पंख हरे हैं।  तब कौआ तोते के पास जाता हैं। तोते को देखकर वह बहुत खुश होता हैं। पर तोता उस से कहता है कि मुझसे सुंदर तो मोर हैं उसके सिर पर सुंदर कलगी हैं। उसकी लंबी और सुर्ख नीली गर्दन है और पंख काफी बड़े और विशाल हैं जब वह अपने हरे पंखों को फैला कर नाचता हैं तब सबका मन मोह लेता हैं।  कौआ जब मोर से मिलता है तो हर्षित हो जाता है उसने इतना सुंदर पक्षी कभी नहीं देखा था। पर मोर उस से कहता है कि मेरी यह सुंदर काया ही मेरे लिए अभिशाप है मेरी सुदंरता के कारण इंसानो ने मुझे कैद कर लिया है और अब में इस पिंजरे में बंद होकर उनका मनोरंजन करता हूँ । मैं अपनी मर्ज़ी से कहीं भी नहीं जा सकता जब इंसानो का दिल करता है तो मुझे नाचना...

जीवन यात्री

 एक बार एक यात्री सफर पर था। सफर करतें हुए रात हो जाने पर वह एक सुफी संत की कुटिया में आराम करनें का निश्चय करता हैं।  वहां पहुंचने पर वह पाता हैं कि संत की कुटिया में बहुत कम समान हैं अचरज में पड़ा यात्री संत से इतने कम समान का कारण पुछता है इस पर संत उसे उसके द्वारा लाए गए कम समान का कारण पूछता है तो वह कहता है कि में तो यात्री हुँ। संत उत्तर देते हुए कहता हैं मैं भी यात्री हूँ।  सुफी संत की यह कहानी हमें अपने अड़ाबरों को छोड़ने की शिक्षा देता हैं। हम अपने जीवन में संचय करतें वक्त यह भूल जाते हैं कि हमारा जीवन सिमित हैं। आदरणीय महात्मा गांधी ने भी कहा था कि इस विश्व में सबकी जरूरत के लिए पर्याप्त संसाधन है परंतु किसी के लालच के लिए नहीं। जब हमारी प्रवृत्ति लालच और लाभ कमाने की हो जाती हैं तब हमारी इच्छा कभी खत्म नहीं होती हैं। हमें यह बात नहीं भुलना चाहिए कि दुसरो के हक को छीन के हम भी सुखी  नहीं रह सकते हैं। और हमारा असल संचय  हमारे अच्छे कर्म , दुसरे के प्रति हमारा व्यवहार, हमारा साहस और शौर्य हैं। 

खुशी

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  एक बार एक महिला भगवान बुद्ध से कहतीं हैं कि "मुझे खुशी चाहिए"। बुध्द उत्तर देते हुए उसे कहतें हैं कि  पहले मुझे या मैं हटाओं यह अंहकार को प्रदर्शित करता हैं। फिर चाहिए को दूर करों क्योंकि यह तृष्णा या अपेक्षा को दिखलाता हैं। अब देखो तुम्हारे पास बस खुशी ही शेष हैं।  खुशी जैसे  साधारण और आसानी से मिल जाने वाले अहसास को हम अपने अंहकार और अपेक्षाओं के चलते जठिल और दूरगामी बना लेतें हैं। हम ज्यादातर बार तो इसलिए नहीं खुश हो पाते क्योंकि हमारा अहम हमें छोटी खुशियों में खुश नहीं होने देता हैं। कई बार हम सामने वाले के साथ नहीं खुश नहीं होते हैं क्योंकि उस व्यक्ति के साथ अहम आड़े आता हैं। खुश न होने का दुसरा कारण हैं खुद और दुसरे से अपेक्षा । अपने से अगर अपेक्षा अगर कम हो तो हम थोड़े में ही खुश हो सकते हैं । साथ में जब हम दुसरे से अपेक्षा रखतें है । अपेक्षा हमेशा हमें निराश ही करतीं हैं। दुसरो से की गई कम अपेक्षा हमें उनके द्वारा की गए छोटे प्रयास भी प्रसन्न कर सकते हैं। अपने खुशी के पैमाने कम रखें और अपेक्षा सिमित तब हम छोटी और महत्वपूर्ण चीजें में खुश हो सकते हैं। साथ ही अ...

हमारे राम

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  एक बार माँ पार्वती शिवजी से ऐसी कथा सुनाने को कहती हैं जो हर दुख में संत्वना दें तब शिव उन्हें रामायण की कथा सुनाते हैं। इसी प्रकार युद्धिष्ठिर जब वनवास में निराश होकर खुद को दोषी मानते हैं तब भी साधुगण उन्हें राम की कथा सुनते हैं। रामायण हमें दुख और विचलित होने वाले क्षणों में धर्य और साहस देती हैं।  जब भी किसी भी आदर्श चरित्र के सर्वोत्तम उदाहरण की बात करते हैं। तब राम की छवि साहसा ही आँखों के सामने आ जाती हैं। राम एक आदर्श पुत्र , पति, भाई एवं राजा थें। राम संयमी, साहासी, मर्यादा पुरुषोत्तम जैसे गुणों से परीपूर्ण थे। राम ने धर्म अधर्म, निति अनीति, न्याय अन्याय के बीच के अंतर से हमें भालिभांति परिचित कराया। एक श्रेष्ठ राजा के सारे गुण होते हुए भी अपने पिता के वचनों का मान रखने के लिए वनवास स्वीकार किया। उन्होंने सही स्थान पर ही अपने क्रोध का परिचय दिया। लक्ष्मण के क्रोध को भी नियंत्रित रखने में भी राम के गंभीर एवं सयंमी चरित्र का महत्वपूर्ण योगदान रहा हैं।आदम्य साहस होने के बाद भी उन्होंने अपने शत्रु को भी संधि का भरपूर अवसर प्रदान किया तुलसीदास जी द्वारा रचित श्री राम चरि...

भारतीय परिवेश की आत्मा- खादी

  19 सितंबर को भारत खादी दिवस मनाता हैं। खादी एक कपड़ा न होकर अपितु भारतीय परिवेश की आत्मा है। खादी का भारतीय संस्कृति एवं इतिहास से काफी गहरा नाता रहा है। एतिहासिक पहलु से देखे तो हाथ से बने सुती धागों का उल्लेख मोहनजोदड़ो सभ्यता के अवशेषों में भी मिलता हैं। भारत की खोज में आए कई व्यपारियों ने भारतीय मसालों के साथ कपास का भी व्यपार किया और खादी को पुनर्जागरण काल युरोप महाद्वीप में भी फैलाया। अपने आरामदायक और शिष्ट स्वरूप से खादी मुलगों के बीच भी काफी प्रसिद्ध रही। अंग्रेजों द्वारा भी कपास की फसल को लूट कर बंगालादेश के बुनकरों के द्वारा बुनकर ब्रिटेन भेजा गया। अंग्रेजों ने युरोप से आने वाले समानों को बढ़ावा दिया और विदेशी कपड़ों का चलन भारत आया। इसके चलते भारतीय अर्थव्यवस्था, किसान, व्यपारीयों एवं बुनकरों की कमर टुट गई। तब महात्मा गांधी जी ने खादी से बने वस्त्रों को ही धारण करने का निर्णय लिया और भारतीय हथकरघों से बने सुत के कपड़े को प्रोत्साहन दिया। उन्होंने भारतीय बुनकरों पर हो रहे अत्याचार और अन्याय को दुर किया। देखते ही देखते इस पहल ने बड़े आन्दोलन का रूप ले लिया और खादी स्वदेशी आंद...

आध्यात्मिक उद्यमिता

भारतीय दर्शन हमेशा से प्रबंधन और आध्यात्मिकता को जोड़ते आया हैं।  भारतीय संस्कृति के अनुसार उद्यमिता और आध्यात्मिकता में भी एक गहरा संबंध है। उद्यमिता  हमारे आंतरिक मूल्यों जैसे की आध्यात्मिकता और संस्कृ ति से ही संचालित होती हैं। उद्यमिता में समाजिक समस्या और उसके समाधान की बात होती हैं। एक अच्छा उद्यमी समस्या का व्यापारिक समाधान ढुंढ कर नए उद्ययम की शुरुआत करता है और उस से धन कमाता हैं। धन का संचय और लाभ कमाना  आध्यात्मिक विचार में भी सही मना गया हैं।  वहीं आध्यात्मिकता हमें अंतरिक संतुलन ,समाजिक उत्थान एवं व्यक्तिगत विकास की बात करतीं है। जब हम आध्यात्मिकता और  उद्यमिता  को मिलाते हैं तो हम पाते हैं कि एक  आध्यात्मिक  उद्यमी  अपने परितंत्र(ecosystem) में सकारात्मक सुधार लाता है। वह स्वयं संतुलित रहकर अपने परितंत्र के महत्वपूर्ण तत्वों को भी संतुलित करता है। वह समाजिक कल्याण और समाज के हर तबके को जीवन यापन के सही अवसर प्रदान करता हैं। आध्यात्मिकता जन कल्याण की बात करतीं हैं और  उद्यमिता  लाभार्जन की जब दोनों मिलतें ह...

खाना खजाना

फ्रांसिसी में कहा जाता हैं कि " La bonne cuisine est le du vrai bonheur"अच्छा खाना असली खुशी की बुनियाद हैं।  आज लॉक डाउन  (lockdown) के समय में बहुत से लोग अपने शौक को पूरा कर रहे हैं।   इनमें से एक शौक जिसमें लोग अपना हुनर आजमा रहे है वह है खाना बनाना या पाक कला। युट्यूब (YouTube) पर काफी लोग तरह तरह के पकवान बनाने का तरीका देख रहें या तो खुद भी  खाना बनाने के विडिओ डाल रहे है । खाना बनाना  न सिर्फ रचनात्मक है बल्कि एक आनंद दायक काम भी हैं।  स्वादिष्ट भोजन न सिर्फ  जबान को भाता है बल्कि शरीर और मन को भी संतुष्ट और खुश करता हैं।  जब हम भारतीय खाने की बात करते हैं तो हमें बहुत ही विविधताएं देखने को मिलती हैं। यह अंतर जलवायु फसलों और जीवन शैली के कारण भी है। पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भारतीय खाना  विविधता में एकता का नायाब उदाहरण है। हम भले चाहे भाषा, क्षेत्र और  वतावरण से भिन्न है पर हमारा खाना हमें एक गहरे जोड़े हुए है।  पर आपको जानकर आश्चर्य होगा आज जो खाना हमारी संस्कृति और दिनचर्या में रच बस गया हैं उसमें से कई ...