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Eat Travel and Pray

  “ Good friend listen to your adventures the best friend makes them with you.” पिछले दिनों की कुछ बहुत अच्छे दोस्तों के साथ की गई शिर्डी यात्रा में ऊपर‌ की गई बात एक दम सही साबित हुई। यात्राएं‌ हमें जीवन भर की सुहानी यादें और‌ बहुत सारा‌ अनुभव देती हैं। यात्रा हमारे ज्ञान को बढ़ाती है और हमारी व्यवहारिक कुशलता को प्रखर करती है। यात्राएं‌ के दौरान‌ हमारा सामना कई प्रकार के लोगों और परिस्थितियों से होता हैं यह हमें एक कुशल संचारक और पारिस्थित्यात्मक नेतृत्व( Situational leadership) क्षमता को बढा़ता है। दोस्तों के साथ की गई यात्राएं‌ रोमांच और मस्ती भरी होती हैं। समान‌ सोच वाले दोस्तों के साथ की गई यात्राएं‌   बहुत सारे किस्से कहानी और चर्चाओं‌ का संसार खोलती है। ऐसी यात्राएं‌ हमारी दोस्ती को और गहरा बनाती हैं। साथ ही हमें कभी ना भूलने वाले किस्से और अनुभव देती हैं। यात्रा हमारी सोच को व्यापक बनाती हैं और हमारे जीवन को नया आयाम देती हैं। यात्रा के दौरान हर जगह की विविधता और विभिन्न प्रकार का भोजन हमें प्रकृति के और करीब ले जाता हैं और हमारी शारीर को और समक्ष और अनुकूल बनाता‌ हैं।

आदि देव शंकरा

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  हिन्दू धर्म के अनुसार भगवान शंकर महेश्वर है वह सौम्य और भोले है उनके जीवन चरित्र से हमें काफी कुछ शिक्षा मिलती है। आज के इस दौर में जब चीजें संतुलित नहीं है इंसान छोटी छोटी बातों पर कोध्रित हो जाता हैं तब भगवान शंकर से हम सौम्यता एवं संतुलन सीख सकते है। भगवान शंकर अपने साथ दो बिलकुल विपरीत गुणों वाली वस्तुओं को लेकर चलते हैं वह वैरागी है पर माँ  पर्वती के साथ आदर्श गृहस्थ भी है। हिन्दू धर्म में उन्हें विनाशक के रुप में देखा जाता हैं पर वह कई कथाओं के सृजनकृता और कई नगरों के निर्माता है वह जल्दी प्रसन्न होने वाले और सौम्य है परंतु अपने रुद्र अवतार में बलशाली और भयावह भी है। वह देवताओं पर भी कृपा करतें है और उन्हें असुर भी प्रिय है। उनके माथे पर चंद्रमा विराजित जो शीतलता का प्रतीक है वही उनके कंठ में विष का वास है जो की उग्रता का प्रतीक हैं। वह अपनी जटाओं में गंगा धारण करें हुए है और उनके तीसरे नैत्र में  अग्नि का वास है। वह नटराज के रूप में कुशल नृत्यक है तो तांडव कर सृष्टि का संधार भी करते हैं। इतनी सारी विषमताओं के साथ भी भगवान शिव संतुलित, संयमी और सौम्य है जबकि हम थोड़ी परेशानी मे

बदलाव

आज हम मार्च माह के दुसरे हफ्ते में प्रवेश कर रहे हैं और अगर आप लोग अपने नव वर्ष संकल्पों पर अभी भी कायम है तो यकीन मानिए की आप अपने संकल्पों में जरूर कामयाब कामयाब होंगे। नया वर्ष हर बार अपने साथ नवसंकल्पों की बेला लेकर आता है। यह अच्छे खाने, जिम जाना, पढने की आदत या किसी बुरी आदत को‌ छोडना हो सकती है। ‌पर हम में से कई इन्हें पूरा नहीं कर पाते हैं साथ ही इन्हें पहले दो महीनो में ही छोड़ देते हैं। किसी भी तरह का संकल्प‌ बदलाव लेकर आता है और इस बदलाव के लिए मन को तैयार करना बहुत कठिन है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी देखा जाए तो कोई भी नई आदत डालने में इक्कीस दिन का समय लगता है और उसे दिनचर्या का हिस्सा बनाने में नब्बे दिन लगते है। ऐसे में हमारा निरंतर प्रयास परम आवश्यक है। हमारा मस्तिक किसी भी कार्य को उससे मिलने वाले प्रतिसाद से जोड़ता है इसलिए वह एक ऐसे तंत्र का निर्माण करता है जो की हर बार आपको उसी सुख का अनुभव कराता है और इस तरह वह हमें अपनी सहज प्रवृत्ति नहीं छोड़ने देता है और नया बदलाव लाना और भी कठिन हो जाता हैं। ऐसे में शुरूआती मुश्किलों को नजरंदाज कर दूरगामी नतीजे पर ध्यान देना

संयोजन सहयोग एवं समन्वय

 पिछले दिनों संस्थान में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में संयोजक की भूमिका निभाने का मौका मिला । आज के लेख में इस आयोजन से मिलने वाले प्रबंधकीय शिक्षाओं (Managerial lesson) की बात करेंगे। किसी भी बड़े एवं जटिल कार्य की शुरुआत में कार्य उतना व्यवस्थित नहीं प्रतीत होता हैं। ऐसे में वरिष्ठ एवं उच्चतर व्यक्तियों का मार्गदर्शन एवं अनुभव काफी मदद करता है । इस समय कार्य में रोज हुई छोटी प्रगति भी मायने रखती हैं क्योंकि कोई भी बड़ा कार्यक्रम छोटे छोटे कार्यों के संयोजन से ही पूरा होता हैं और यह छोटी उपलब्धियां हमें प्रोत्साहित करती हैं। किसी भी महत्वपूर्ण एवं विशेष कार्य को सम्पूर्ण करने के लिए सामूहिक प्रयास वरिष्ठों का सहयोग एवं बड़ो का आशीर्वाद बहुत आवश्यक है। साथ ही उनका मार्गदर्शन और हम पर किया गया विश्वास हमारे आत्मविश्वास को प्रबल करता है । और हम विश्वास के साथ कोई भी बड़ा काम कर देते हैं। कोविड काल में संगोष्ठी का आयोजन वरचुअल मोड में किया गया और इसकी सफलता में तकनीकी माध्यमों के योगदान की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता हैं परंतु तकनीक के उचित उपयोग के लिए भी तकनीकी दक्षता के अलावा परस

स्कूल चले हम

  पिछले साल मार्च में बंद हुए स्कूल और कॉलेज को सरकार ने धीरे धीरे एवं ‌क्रमश खोलने के आदेश दिए हैं। इसमें अभी छोटे बच्चों के स्कूल सावधानी पूर्वक बंद रखें जाएगें।‌ यह फैसला स्वागत योग्य हैं साथ ही शैक्षिक संस्थानों को इस बात का पूरा ध्यान रखना होगा की संस्थान पूरी सावधानी के साथ सामाजिक दूरी (Social Distancing) का ध्यान रखते हुए। सरकार द्वारा दिए गए दिशानिर्देशों का पालन करते हुए ही खोले जाएं।   पिछले वर्ष जब सारी शिक्षा व्यवस्था ऑनलाइन प्रणाली में बदल गई तब कुछ स्कूलों और विधार्थियों ने प्रारंभिक कठिनाइयों के बाद अपने आपको इसके अनुकूल बना लिया। परंतु UNESCO के अध्ययन के अनुसार स्कूल बंद होने पर बाल मजदूरी और बाल विवाह जैसे घटनाओं में बढ़ोतरी हुई साथ ही तकनीकी माध्यमों की कमी की वजह से कई बच्चों की पढा़ई बीच में ही छुट गई। कुल मिलाकर बच्चों और किशोरों के लिए पिछला साल मिला जुला रहा। बीते वर्ष ने बाल मनोविज्ञान   के काफी सबक सिखाए। जि