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समुद्र मंथन से आत्ममंथन।

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हिन्दू धर्म में समुद्र मंथन की कथा काफी प्रचलित हैं। इस कथा को समझा जाए तो इस से  हमें प्रबंधन के बहुत सारे पाठ सीखने को मिलतें हैं।दरअसल समुद्र मंथन आत्म मंथन की ही कथा हैं  समुद्र मंथन में से निकली वस्तुओं पर ध्यान दें तो पाएंगे की इसमें सबसे पहले हलाहल विष निकला था। अगर हम भी अपना आत्म मंथन करें तो हमें भी सबसे पहले हमारी बुरी आदत या बुराई ही निकल कर आती हैं। जिसे हम विष की संज्ञा दे सकते हैं। इस विष को भगवान शिव ने ग्रहण किया और उसे अंदर न लेकर गले में रख लिया शिव जी यहां यहीं शिक्षा देतें हैं कि हमें अपनी बुराइयों को अंदर नहीं धारण करना चाहिए या अगर हम में कोई बुराई हैं भी तो हमारी पहचान उसके द्वारा नहीं होनी चाहिए। उसके बाद समुद्र मंथन से कई उपयोगी पंरतु भौतिक वस्तुएं निकलती हैं जिन्हें देवता और असुर आपस में बांट लेते  हैं समुद्र मंथन का असली उद्देश्य अमृत की प्राप्ति था। यहां हम देखे तो मंथन से निकले बहु मुल्य रत्न और वस्तुएं आत्म मंथन के संदर्भ में भौतिक सुख जैसे कि घर, गाडी़, जैवर आदि की बात करता हैं यह सब चीजें उपयोगी हैं पर कई बार हम इन सुखों में इतना खो जाते हैं कि हम खुद क

सतनाम श्री वाहे गुरु

  भारतीय संस्कृति सदैव ही अपनी विविधता और सर्वधर्म सदभाव के लिए जानी जाती हैं। भारतीय संस्कृति को कई धर्मो ने प्रभावित किया और भारत ने इन्हें मुक्त ह्रदय से अपनाया और उनमें छुपे दया , करूणा और आराधना के भाव को आत्मसात किया। भारत को प्रभावित करने वाले सभी धर्मो में सिख धर्म एक बहुत ही प्रमुख धर्म है। सिख धर्म के पहले गुरू श्री गुरुनानक देव जी अपने सरल व्यक्तित्व नीतिगत और व्यवहारिक शिक्षाओं के कारण हर भारतीय के लिए सम्मानित , प्रतिष्ठित और पूज्यनीय बनाता है। यो तो गुरुनानक देव जी   का पूरा जीवन प्रेरणादायक है पर यहाँ उनके जीवन के दो प्रसंगो   की चर्चा करते हैं जिससे हमें सहजता और ईमानदारी की शिक्षा मिलती है। पहले प्रसंग में जब वह यात्रा के दौरान किसी घर में विश्राम करने रूकते है और बिस्तर पर‌ लेटते समय उनके पैर घर के आराध्य की तस्वीरो की तरफ हो जाते है तब घरमालिक के अनुरोध पर‌ वह जब पैर दूसरी तरफ करतें हैं तब वह तस्वीर भी अपनी जगह बदल कर फिर से उनके पैरों की तरफ हो जाती है। इस घटना से हमें उनकी सहजता और आराध्य के सम्मान के गुणों का पता चलता है वह खुद ईश्वर स्वरूप होकर भी सहजता से घरमा

शोषक और शोषित

 भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन की प्रसिध्द कहानी अब्बू खां की बकरी बहुत ही प्रेरणादायक कहानी हैं और अपने आप में शोषक और शोषित के बीच के संबंध को दर्शाती हैं।  कहानी की मुख्य पात्र चाँदनी नाम की बकरी हैं जो कि उस भेडियें से भीड़ जाती हैं जो अब्बू खां की बकरियों को खा जाता हैं। अंत में बकरी लड़ते हुए शहीद हो जाती हैं। तब सभी कहते हैं भेडियां जीता पर अब्बू खां कहते हैं कि बकरी जीती क्योंकि उसके बाद घायल भेडियां किसी भी बकरी पर हमला नहीं करता। कहानी से यह शिक्षा मिलती हैं कि जब तक हम हमारे शोषण पर आवाज नहीं उठाएगे तब तक हम शोषित ही रहेगें  बहुत बार हम इसलिए चुप हो जाते हैं क्योंकि हमें लगता है कि शोषक हम से ज्यादा बलशाली हैं या तो अन्याय हम पर सीधे नहीं हुआ हैं और हम उससे बचकर निकलने में ही अपना भला मानते हैं। एक आम आदमी हमेशा अपने जीवन में उस नायक को ढूंढते रहते हैं जो हमारी हर समस्या का निदान कर दें हमें यह बात याद रखनी चाहिए कि हम जब तक अन्याय का विरोध नहीं करगें तब तक हम पर अन्याय होता रहेंगा हो सकता है की हमारे संधर्ष से आने वाले लोगों का भला हो जाए जैसा की बताई गई कहानी से प्

सर्वे भवन्तु सुखिनः

महान उद्यमी स्टीव जॉब्स ने अपनी स्टैंडफोर्ड  विश्वविधालय के भाषण  में कहा था कि उनके संघर्ष को दिनों में उन्हें हफ्ते भर के इंतज़ार के बाद इस्कॉन मंदिर में मिलने वाला प्रसाद एक अच्छे खाने के रूप में मिलता था। प्रख्यात शेफ (chef) राजीव खन्ना  ने भी कुछ साल पहले दिए गए एक  साक्षात्कार (Interview) में कहा था की उन्हें भूख का अंदाज अमेरिका में आकर हुआ, भारत में हर जगह चलने वाले लंगर और प्रसादी ने उन्हें कभी भूखा नहीं रहने दिया। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया के दर्शन को ‌मानने वाली भारतीय संस्कृति में परोपकार की भावना को सर्वोपरि मना गया है। भारतीय अपने भोजन को हमेशा बाँट कर खाने पर विश्वास रखते है और हमारी संस्कृति में भोजन को पहले भगवान को अर्पित कर प्रसाद के रूप में जरूरमंदो में बाँटने का प्रचलन है और इस परम्परा को हर भारतीय पूरी आस्था से निभाता है। भारत में प्रचलित हर धर्म के पूजा स्थल पर गरीबों और भुखे को खाना की व्यवस्था रहती है। फिर चाहे वह हिन्दू मंदिरो में लगने वाले अन्नकुट या भंडारे हो या इस्कॉन द्वारा चलने वाला अक्षयपात्र सिख धर्म के अनुआइयों द्वारा विभिन्न गुरुद्वारों म

नई शुरुआत सही शुरुआत

कोई भी नए रिश्ते की  शुरुआत करने के पहले पुराने रिश्तों को छोड़ना पड़ता हैं। यह बात न सिर्फ रिश्तों पर हर नई पहल के साथ लागू होती है। पर यह कहने में ज्यादा आसान लगता है और करने में बहुत कठिन। विशेष रूप से रिश्तों से मिल रहे भावनात्मक जुड़ाव और खुशी उन्हें छोड़ना और भी असंभव बनाती हैं। प्राय: हमें रिश्तों की समझ काफी बाद में होती हैं और तब तक उनमें व्याप्त विषाक्तता और नकारात्मकता हमें घेर लेती हैं। याद रखे पूरे जीवन में हमारा सबसे अहम रिश्ता खुद से हैं और उससे अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। किसी भी विषैले और नकारात्मक व्यक्ति और रिश्तों से दूर होना सबसे बड़ा तोहफा हैं जो आप खुद को दे सकते हैं। बुरी चीजों के हटने से ही अच्छी चीजें जीवन में आएगी। नकारात्मक रिश्तों से बाहर आना आप का अपने लिए लिया सबसे अहम फैसला है। आप कोई सुधारगृह नहीं‌ हो जो लोगों को ठीक करें। हमें इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि हम अपनी कमजोरियां किसे उजागर कर रहे है क्योंकि एक विषाक्त व्यक्ति उन्हें हमारे खिलाफ इस्तेमाल करने में जरा भी संकोच नहीं करेगा। विषैले और नकारात्मक व्यक्ति आपकी खुशी में खुश नहीं होगें क्योंक

श्री गणेश

 आज के इस लेख में हिन्दुओं के सबसे लोकप्रिय देवता गणेश जी की बात करते हैं। गणेश जी बुद्धि और विवेक के देवता है वह गजमुख और बड़ी काया वाले है वह समाज में व्याप्त शारीरिक आकर्षण की मान्यताओं को तोड़ते है और बुद्धिमत्ता और सौम्यता पर जोर देतें हैं। गणेशजी का सौम्य और सुदंर रूप और उनका सहज स्वभाव उन्हें पूज्यनीय बनाता है। हिन्दू धर्म वैसे ‌भी अपने देवी देवताओं से भावनात्मक रुप से जुड़ाव रखने पर जोर देता है और हमारा दिव्यता का अनुभव भी हमें प्रतीकात्मक चिन्हों के माध्यम से ही होता है। यही जुड़ाव हमें हमारे देवी देवताओं के प्रति सहज बनाता है और पीढ़ियों  से हमारी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं जिस में तर्कसंगत बात की अपेक्षा भावनाएँ प्रबल हैं। इसलिए गणेशजी का गजमुख और विशालकाय होना हमें सहज लगता हैं। और उनसे जुड़ी कहानियों पर सहसा ही विश्वास हो जाता हैं। जब महाभारत जैसा विशाल ग्रंथ लिखने के लिए वेद व्यास जी किसी योग्य पात्र की तलाश में थे। तब उन्होंने यह कार्य गणेशजी द्वारा करवाया क्योंकि वह यह चाहते थे कि इसे लिखने वाला बिना रुके और‌ बिना किसी अवधारणा पूर्वानुमान  और आलोचना के लिखे गणेशजी की सह

जोश और जुनून

 टोक्यो ओलंपिक और पैरालंपिक में भारतीय खिलाड़ियों ने अद्भुत‌ और जबरदस्त खेल और कौशल   प्रस्तुत  कर अभी तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया। सात मेडलों के साथ भारतीय खेमा हॉकी, बेडमिंटन, कुश्ती, वेटलिंफटिंग और भाला फेंक जैसे परम्परागत खेलों में मैडल जीतने में कामयाब हुआ। वहीं फेनसींग जैसे  नए खेल में अपने जौहर दिखाए। पैरालंपिक में भी भारतीय खिलाड़ियों का शानदार प्रदर्शन जारी है चार स्वर्ण सात चाँदी और छह कांस्य के साथ यह‌‌ लेख लिखे जाने तक कुल सत्रह पदक के साथ अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया पदकों की संख्या आगे भी बढ़ेगी। सबसे अच्छी बात यही रही है कि व्यक्तिगत या टीम  हर प्रकार के खेलों में  खिलाड़ियों ने दम दिखाया। इसमें कोई दो राय  नहीं है कि लक्ष्य को पाने के लिए कड़ी मेहनत निरंतर प्रयास धैर्य एकाग्रता विश्वास के साथ  जोश‌ और‌ जनून भी उतना ही आवश्यक है‌ आज का लेख हर खिलाड़ी के जो‌श और‌ जनून को समर्पित है जिसने न सिर्फ उन्हें सफल बनाया अपितु पूरे देश को जोश, जनून, गौरव, खुशी और उत्साह से भर दिया। जीवन में कुछ कर गुजरने के लिए जोश और जुनून ‌ दोनों की जरूरत होती हैं। जीवन का