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अभिव्यक्ति

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जीवन बहुत गंभीरता से जीने के लिए नहीं हैं। हँसना ,मुसकुराना, अच्छा संगीत, नाचना, मस्ती करना और उल्लास के साथ जीकर ही हम खुश रह सकते हैं। पर इन सब बातों के बीच जीवन में अभिव्यक्ति (manifestation) का होना बहुत जरूरी हैं। जब हम जीवन में किसी लक्ष्य को अभिव्यक्त करतें हैं तब हमारा अवचेतन मन (sub conscious mind ) उस लक्ष्य के प्रति सचेत हो जाता हैं और सजगता से अपने लक्ष्य के बारे में आने वाली सारी जानकारी जुटाने लगता हैं।   यह बात मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से कह सकता हूँ। ब्लॉग लिखने की मेरी इच्छा काफी सालों से थी और मैंने खुद को एक ब्लॉगर होने का परिप्रेक्ष्य दिया। उस से संबंधित जानकारी इकट्ठा करने लगा। थोड़ा लिखना भी शुरू किया नतीजे उत्साहजनक नहीं थें पर रूका नहीं और फिर एक व्यक्तित्व विकास के कार्यक्रम में  एक स्थापित लेखक से मुलाकात हुई और ब्लॉगिंग (blogging) की शुरुआत हुई। अभिव्यक्ति अवचेतन मन को सबल बनाती हैं और फिर एक न एक दिन लक्ष्य जरूर प्राप्त होता हैं।  अंत में इतना ही कहना चाहता हूँ कि साहस भरे सपने देखें और उन्हें पूरा करने की चाह रखिए । इस लेख का अंत रॉबर्ट फ्रॉस्ट (Robert Forst

झिलमिल सी दिवाली

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  दिपावली हमेशा ‌ से सुख समृद्धिऔर संपन्नता का त्यौहार रहा है। पांच दिन चलने वाला ‌ यह त्यौहार आर्थिक विषमताओं को भी दूर करता है समाज के हर वर्ग को धनार्जन करने का मौका देता है।   दिवाली ‌ न सिर्फ हिन्दुओं के लिए शुभ है अपितु सारे ‌ धर्म के लोग भी इसे महत्वपूर्ण मानते है। दिवाली के ‌ दिन ही सिख धर्म के छटे युवा गुरु श्री हरगोविंद जी को अमृतसर में रिहा किया गया। जैन धर्म के अनुसार दिपावली भगवान   महावीर का निर्वाण दिवस है बौद्ध धर्म के लोगों का मानना है कि दीवाली के दिन ही महाराज अशोक ने शस्त्र त्याग कर बौद्ध धर्म अपनाया था और घोर हिंसा छोड़कर अहिंसक हो गए। भारत के विभिन्न प्रांत में भी दीवाली अलग - अलग कारण से मनाई जाती हैं। उत्तर भारत में दीवाली प्रभु श्रीराम के वनवास से अयोध्या वापस आने के उपलक्ष्य में मनाई जाती हैं।दक्षिण भारत में श्री कृष्ण द्वारा नरकासुर राक्षस के वध के उपलक्ष्य में और वहीँ पश्चिमी प्रांत में भगवान विष्णुजी

शक्ति और सामर्थ्य

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  आज के लेख की शुरुआत भगवान बुद्ध की एक कहानी से करते हैं। महात्मा बुद्ध की शिक्षा तथ्यवादी सत्य को प्रमाणित करती हैं‌ और प्रासंगिक है बुद्ध आध्यात्मिक दृष्टिकोण के साथ व्यवहारिक ज्ञान पर भी जोर देतें हैं।‌ हम सौभाग्यशाली है कि बुद्ध का ज्ञान हमें प्राप्त हुआ।     बचपन में हम सभी ने डाकू अंगुलिमाल की कहानी सुनी है। डाकू अंगुलिमाल लोगों को लूटकर और उनको जान से मारकर उनकी ऊंगली की माला बनाकर पहन लेता था, जिससे उसका नाम अंगुलिमाल हो गया। ‌भगवान बुद्ध से मुलाकात होने पर उनके तेज से प्रभावित हो गया। भगवान बुद्ध ने उससे एक पेड़ से दस पत्तों को तोड़कर लाने को कहा I बाद में उन्हें जोड़ने को कहा जिसे करने में वह असमर्थ हो जाता हैं। तब तथागत उसे कहते हैं कि तुम यह हिंसा कब रुकोगे और वह इससे सीख लेकर संत बन जाता हैं।   अगर हम देखे तो यह कहानी हमें शक्ति और सामर्थ्य के उचित उपयोग की शिक्षा देतीं हैं। जब भी हमारे पास शक्ति और सामर्थ्य