दुःख और संताप

 रामायण में हनुमान जी हमें श्रेष्ठ प्रबंधन और नेतृत्व के की पाठ पढ़ाते हैं और वह न केवल हमें चुनौतियां से लड़ने की अपितु हर समय शांत और स्थिर रहने की भी शिक्षा देते हैं। आज के लेख में हम रामायण के दो बहुत ही कम चर्चित पात्रों की बात करने वाले हैं और रामायण के हर प्रसंग और पात्र की तरह यह दोनों भी हमें सकारात्मक जीवन की शिक्षा प्रदान करतें हैं और इन्हें भी हनुमान जी के द्वारा ही खोजा और प्रेरित किया गया है। 

हनुमान अंगद नल और नील सीता माता की खोज में दक्षिण भारत में कई और जाते हैं और वह हर जगह सीता माता को खोजते हैं पर उन्हें सीता का कुछ पता नहीं चलता आगे चलते हुए उन्हें एक बड़ी ही विचित्र वीरान और सुनसान गुफा दिखाई देती है। उस गुफा में जीवन का कोई भी अंश दिखाई नहीं देता है और वह गुफा मृत्यु की घाटी की तरह प्रतीत होती है।

हनुमान जी उस गुफा में प्रवेश करने की पहल करते हैं तब वानर उन्हें समझाते हैं कि यह एक मायावी लोक है और गुफा के अंदर कोई राक्षस हो सकता है तब हनुमान उन्हें कहते हैं कि हमें कोई भी जगह बिना देखे नहीं रह सकतें हैं हो सकता है कि सीता माता इसी गुफा में हो और शायद कोई हमें इस गुफा में सीता माता का पता बता दें। हनुमान उस मृत्यु की घाटी में प्रवेश करते हैं और उन्हें उस गुफा में प्रवेश करने में काफी परेशानी होती है। गुफा के मध्य में पहुंचते हैं वहां उन्हें तप में लीन ऋषि कंडु मिलते हैं वह ऋषि पत्थर की तरह कठोर और निष्ठुर रहते हैं। हनुमान की प्रार्थना का उन पर कोई असर नहीं होता और जब वह आंखें खोलते हैं तब उनसे आग निकलती है। 

हनुमान के करूणा वचन और आत्म चिंतन की बात सुनकर ऋषि का हृदय द्रवित होता है और वह कहते है कि उन्होंने अपने एक युवा पुत्र को असमय ही खो दिया और उसी के दुःख और संताप के कारण ही यह घाटी सुखी बंजर और वीरान हो गई है वह जितना दुःखी होते हैं  यह घाटी उतनी ही बंजर और जीवन रहित हो जाती है। 

हनुमान जी उन्हें समझाते हैं कि आपके दुःख का कारण है कि आप अपने अतीत से बाहर नहीं आने चाहते हैं आपके साथ काफी बुरा हुआ और मेरी सांत्वना आपके साथ है परंतु जब तक हम अपने अतीत से नहीं निकलते तब तक हम हम अपने वर्तमान और भविष्य दोनों को ही खराब करते हैं। हनुमान उन्हें वर्तमान में जीने की शिक्षा देते हैं। हनुमान की करुणा भरी और प्रोत्साहित करने वाली बातें से ऋषि का हृदय परिवर्तन होता है और उस वीरान घाटी में फिर से जीवन संचालित हुआ नदियां बह उठी और घाटी फिर से भरी हो गई।

ऋषि कंडु को नया जीवन देकर हनुमान जी अपने साथियों को आगे बढ़ते हैं। आगे उन्हें फिर से एक गुफा मिलती है इस बार भी हनुमान के सभी साथी गुफा में जाने पर संशय जताते है तब हनुमान उन्हें फिर उत्साहित करतें हैं। समय काटने के लिए वह गीत गाने लगते हैं तभी गुफा के दुसरी ओर से भी गाने की आवाज आने लगती है वानर फिर डर जाते हैं पर हनुमान उन्हें फिर आगे बढ़ने की कहते हैं। 

आगे बढ़ने पर उन्हें एक बहुत ही सुन्दर घाटी मिलती है जिसमें सुन्दर झरनें और वन होते हैं वह हर तरह जीवंत घाटी होती है वहां उनकी मुलाकात स्वयंप्रभा से होती है लोक कथाओं के अनुसार स्वयंप्रभा तारा की तरह वानर कन्या थी और सुग्रीव से प्रेम करती थी। परंतु सुग्रीव तारा पर मोहित था और वह स्वयंप्रभा को अस्वीकार कर देता है। सुग्रीव द्वारा ठुकराने पर स्वयंप्रभा उसी गुफा में आ जाती है। वह निराश हो जाती है परंतु वह अपने दुःख और संताप को भुलाकर उस गुफा और घाटी को जीवंत और सुखमय कर देती है। स्वयंप्रभा के नाम से ही जैसा पता चलता है कि वह जो प्रभा या उजाले से सारे विश्व को रोशन कर दें।

हनुमान और उनके साथियों से मिलकर वह बहुत खुश होती है बहुत दिनों बाद उसे अपनी बिरादरी के लोग मिलते हैं। वह उन्हें फल और भोजन देती है और बताती है की सीता माता की खोज में तुम लोगों को सुदुर दक्षिण की तरह अपनी यात्रा जारी रखनी चाहिए। 

ऋषि कंडु और स्वयंप्रभा की कहानी हमें दो शिक्षा देती है प्रथम तो कि हमेशा वर्तमान में जीने चाहिए अतीत की भुले और तकलीफें और भविष्य की अनिश्चितता हमें वर्तमान में जीने और उसका आनंद लेने से रोकती है दुसरी और महत्वपूर्ण शिक्षा यह की हम अपने दुःख और संताप से हतोत्साहित होकर ऋषि कंडु की तरह अपने और अपने आसपास को निराशा और आशाहीनता से घेर ले या फिर स्वयंप्रभा की तरह अपने दुःख और संताप से प्रोत्साहित होकर अपने जीवन को आशा, उल्लास और सुख से भर लें। हम सभी के जीवन में दुःख संताप और विफलता आती ही है पर हम उनसे उबर कर खुद को फिर से साबित और सफल हो सकते हैं।

यह लेख ऑडिबल पर आंनद नीलकंठन द्वारा प्रस्तुत पॉडकास्ट मेनी रामायण मेनी लेसन से प्रेरित है। 

डॉ जितेन्द्र पटैल। 


 


 

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